Sunday, 15 January 2017

"सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद है
दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है "
यह तस्वीर 67 साल के गणतंत्र को बख़ूबी बयां कर रही है। कुछ दशक पहले प्रख्यात व्यंगकार हरिशंकर परसाई जी ने अपनी किताब 'ठिठुरता हुआ गणतंत्र' में लिखा था कि  'मैं एक सपना देखता हूँ। समाजवाद आ गया है और वह बस्ती के बाहर टीले पर खड़ा है। बस्ती के लोग आरती सजाकर उसका स्वागत करने को तैयार खड़े हैं। पर टीले को घेरे खड़े हैं कई समाजवादी। उनमें से हरेक लोगों से कहकर आया है कि समाजवाद को हाथ पकड़कर मैं ही लाऊँगा।' 
लाल किला और जनपथ से हर साल घोषणा की जाती रही है । इस वर्ष भी होगी । घोषणाएं होंगी- गरीबी हटाएंगे , बेरोजगारी हटाएंगे , समृद्धशाली राष्ट्र बनाएंगे और हम विश्व गुरु बन जाएंगे । फिर कुछ दिनों बाद इसी तरह देश के किसी गली किसी चौराहे पर गणतंत्र ठिठुरता हुआ दिख जाएगा। इंसानियत दम तोड़ती नजर आएगी। ये सिलसिला है, अनवरत चलेगी... निर्बाध चलेगी... अतीत के गंगा-यमुना की तरह अविरल।  अगर सही मायने में देखा जाए तो भारत  के लिए गरीबी बीमारी नहीं बल्कि लाचारी है। हां, गरीबी लाचारी है राजनीति को दिलचस्प बनाने के लिए। एक मुद्दा बनाने के लिए जिसपर राजनीतिज्ञ अपनी-अपनी रोटियां सेकेंगे। जिसपर भाषणों में नारेबाजी होगी।जिसपर जनमानस को , मुआफ़ी ! तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को भी एकत्रित किया जाएगा। 

कुछ लोग एक-आध  लेख लिख देंगे  , ठीक  ऐसे ही जैसे मैं लिख रहा हूँ । एक फर्क रहेगा- स्वार्थ का। स्वार्थ का जो अकादमियों, पुरस्कारों और राज्यसभा का द्वार खोलेगी। फिर वैसे ही मौन हो जाएंगे जैसे कि द्रोपदी चीर हरण के समय भीष्म पितामह थे। विवश, लाचार, प्रण से बंधे, राष्ट्रप्रेम का दंभ भरते ।

दुष्यंत कुमार 'साये में धूप' में सवाल पूछने की गुस्ताखी कर बैठे थे :



" ना हो कमीज तो पाओ से पेट ढक लेंगे

  ये लोग कितने मुनासिब है इस सफ़र के लिए"

एक गुमसुम सा ही सही लेकिन सियासतदान एक जवाब दे देंगे-

' मुनासिब का नहीं मालूम मगर जरूरी हैं ऐसे लोग
 सत्ता तक पहुँचाने का रस्ता आसान कर देते हैं ये '


खैर,जश्न मनाइए ... 100, 200, 300 , 500 का टिकट (नोट- किसी वीआईपी से रिश्तेदारी हो तो मुफ्त पास का जुगाड़ हो सकता है )  लेकर आप भी जाइए 26 जनवरी का परेड देखने। राजपथ पर सजे-संवरे (मगर स्क्रिप्टेड ) भारत को देख आइए। जरा धक्का-मुक्की बर्दास्त करिए और अगर जान में जान बची रहे और हौसला बची रहे तो जरा दिल्ली के दिल (सीपी) से निकलकर दिल्ली के जिस्म और रूह का भी एक चक्कर लगा आइए। अगर आप कुछ मदद करने के सामर्थ्य में हो तो जरूर प्रयास कीजिएगा। ताकि कम से कम  'ठिठुरते हुए गणतंत्र' को जरा सी राहत मिल सके ।